मुख्य लौकिक युग सत्य (उकृत), त्रेता, द्वापर और कलिनाम से चार भागों में (चतुर्धा) विभक्त है। इस युग के आधार पर ही मन्वंतर और कल्प की गणना की जाती है। इस गणना के अनुसार सत्य आदि चार युग संध्या (युगारंभ के पहले का काल) और संध्यांश (युगांत के बाद का काल) के साथ 12000 वर्ष परिमित होते हैं। चार युगों का मान 4000 + 3000 + 2000 + 1000 = 10000 वर्ष है; संध्या का 400 + 300 + 200 + 100 = 1000 वर्ष; संध्यांश का भी 1000 वर्ष है। युगों का यह परिमाण दिव्य वर्ष में है। दिव्य वर्ष = 360 मनुष्य वर्ष है; अत: 12000 x 360 = 4320000 वर्ष चतुर्युग का मानुष परिमाण हुआ। तदनुसार सत्ययुग = 1728000; त्रेता = 1296000; द्वापर = 864000; कलि = 432000 वर्ष है। ईद्दश 1000 चतुर्युग (चतुर्युग को युग भी कहा जाता है) से एक कल्प याने ब्रह्मा की आयु 100 वर्ष है। 71 दिव्ययुगों से एक मन्वंतर होता है। यह वस्तुत: महायुग है। अन्य अवांतर युग भी है।
Bhagwat Gita Chapter 18 Verse 11: आपको बता दें कि इस लेख में भगवान कृष्ण भागवत गीता के श्लोक के माध्यम से अर्जुन को समझाते है की कर्म फल का त्यागी है, वही त्यागी है ! आखिर ऐसा क्यों है ? न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः , यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ( अध्याय 18, श्लोक 11 ) न–नहीं; हि-वास्तव में ही; देह-भृता-देहधारी जीवों के लिए; शक्यम्-सम्भव है; त्यक्तुम्-त्यागना; कर्माणि-कर्म; अशेषतः-पूर्णतया; यः-जो; तु-लेकिन; कर्म-फल-कर्मो के फल; त्यागी कर्मफलों को भोगने की इच्छा का त्याग करने वाला; सः वे; त्यागी कर्म फलो का भोगने की इच्छा का त्याग करने वाला; इति-इस प्रकार; अभिधीयते-कहलाता है। अर्थ - देहधारी मनुष्य के द्वारा सम्पूर्ण कर्मों का त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्म फल का त्यागी है, वही त्यागी है। ऐसा कहा जाता है। व्याख्या - देहधारी अर्थात् देह के साथ तादात्म्य रखने वाले मनुष्यों के द्वारा कर्मों का सर्वथा त्याग होना सम्भव नहीं है क्योंकि शरीर प्रकृति का कार्य है और प्रकृति स्वतः क्रियाशील है। अतः शरीर के साथ तादात्म्य (एकता) रखने वाला क्रिय...
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