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हिन्दू समुदाय

सनातन धर्म में चार पुरुषार्थ स्वीकार किए गये हैं जिनमें धर्म प्रमुख है। तीन अन्य पुरुषार्थ ये हैं- अर्थ, काम और मोक्ष।
गौतम ऋषि कहते हैं - 'यतो अभ्युदयनिश्रेयस सिद्धिः स धर्म।' (जिस काम के करने से अभ्युदय और निश्रेयस की सिद्धि हो वह धर्म है। )
मनु ने मानव धर्म के दस लक्षण बताये हैं:
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥
(धृति (धैर्य), क्षमा (दूसरों के द्वारा किये गये अपराध को माफ कर देना, क्षमाशील होना), दम (अपनी वासनाओं पर नियन्त्रण करना), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (अन्तरंग और बाह्य शुचिता), इन्द्रिय निग्रहः (इन्द्रियों को वश मे रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग), विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा), सत्य (मन वचन कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना) ; ये दस मानव धर्म के लक्षण हैं।)
जो अपने अनुकूल न हो वैसा व्यवहार दूसरे के साथ नहीं करना चाहिये - यह धर्म की कसौटी है।
श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैव अनुवर्त्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचरेत् ॥
(धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो और सुनकर उस पर चलो ! अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये।)
उपरोक्त मानव धर्म का पालन करने वाला हिन्दू समुदाय विश्व के सभी बड़े समुदायों में सबसे पुराना है। यह समुदाय पहले आर्य (श्रेष्ठ) नाम से संबोधित किया जाता था। इस समुदाय की कई मान्यताएँ वेदों पर आधारित है, यह समुदाय अपने अन्दर कई अलग अलग उपासना पद्धतियाँ, मत, सम्प्रदाय को मानने वालों को समेटे हुए हैं। ये दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा समुदाय है, पर इसके ज़्यादातर लोग भारत में हैं और विश्व का सबसे अधिक हिन्दुओं का प्रतिशत नेपाल में है। हालाँकि इस समुदाय के लोगों द्वारा कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, लेकिन असल में ये एकेश्वरवादी धर्म है।
इस समुदाय के लोग स्वयं को सनातन धर्म अथवा वैदिक धर्म मानने वाला कहते हैं। इंडोनेशिया में इस धर्म का औपचारिक नाम "हिन्दु आगम" है। हिन्दू केवल एक सम्प्रदाय ही नहीं है अपितु जीवन जीने की एक पद्धति है। लोगों का मानना है कि "हिन्सायाम दूयते या सा हिन्दू" अर्थात जो अपने मन वचन कर्म से हिंसा से दूर रहे वह हिन्दू है।

वात्स्यायन के अनुसार धर्मसंपादित करें

वात्स्यायन ने धर्म और अधर्म की तुलना करके धर्म को स्पष्ट किया है। वात्स्यायन मानते हैं कि मानव के लिए धर्म मनसा, वाचा, कर्मणा होता है। यह केवल क्रिया या कर्मों से सम्बन्धित नहीं है बल्कि धर्म चिन्तन और वाणी से भी संबंधित है।[1]
  • शरीर का अधर्म : हिंसा, अस्तेय, प्रतिसिद्ध मैथुन
  • शरीर का धर्म : दान, परित्राण, परिचरण (दूसरों की सेवा करना)
  • बोले और लिखे गये शब्दों द्वारा अधर्म : मिथ्या, परुष, सूचना, असम्बन्ध
  • बोले और लिखे गये शब्दों द्वारा धर्म : सत्व, हितवचन, प्रियवचन, स्वाध्याय (self study)
  • मन का अधर्म : परद्रोह, परद्रव्याभिप्सा (दूसरे का द्रव्य पा लेने की इच्छ), नास्तिक्य (denial of the existence of morals and religiosity)
  • मन का धर्म : दया, स्पृहा (disinterestedness), और श्रद्धा

महाभारतसंपादित करें

महाभारत के वनपर्व (३१३/१२८) में कहा है-
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन कभी न करना, इस डर से कि मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले।
दूसरे शब्दों में, जो पुरूष धर्म का नाश करता है, उसी का नाश धर्म कर देता है। और जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी धर्म भी रक्षा करता है। इसलिए मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले, इस भय से धर्म का हनन अर्थात् त्याग कभी न करना चाहिए।

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