सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

योग

A male yogi
Two female yoginis
१७वीं-१८वीं शताब्दी के एक भारतीय चित्र में योगी तथा योगिनी
पद्मासन मुद्रा में यौगिक ध्यानस्थ शिव-मूर्ति
योग भारत और नेपाल में एक आध्यात्मिक प्रकिया को कहते हैं जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने (योग) का काम होता है। यह शब्द, प्रक्रिया और धारणा बौद्ध धर्म,जैन धर्म और हिंदू धर्म में ध्यान प्रक्रिया से सम्बंधित है। योग शब्द भारत से बौद्ध धर्म के साथ चीनजापानतिब्बत, दक्षिण पूर्व एशिया और श्री लंका में भी फैल गया है और इस समय सारे सभ्य जगत्‌ में लोग इससे परिचित हैं।
इतनी प्रसिद्धि के बाद पहली बार ११ दिसंबर २०१४ को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रत्येक बर्ष २१ जून को विश्व योग दिवस के रूप में मान्यता दी है। भगवद्गीता प्रतिष्ठित ग्रंथ माना जाता है। उसमें योग शब्द का कई बार प्रयोग हुआ है, कभी अकेले और कभी सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, संन्यासयोग, कर्मयोग। वेदोत्तर काल में भक्तियोग और हठयोग नाम भी प्रचलित हो गए हैं पतंजलि योगदर्शन में क्रियायोग शब्द देखने में आता है। पाशुपत योग और माहेश्वर योग जैसे शब्दों के भी प्रसंग मिलते है। इन सब स्थलों में योग शब्द के जो अर्थ हैं वह एक दूसरे के विरोधी हैं परंतु इस प्रकार के विभिन्न प्रयोगों को देखने से यह तो स्पष्ट हो जाता है, कि योग की परिभाषा करना कठिन कार्य है। परिभाषाऐसी होनी चाहिए जो अव्याप्ति और अतिव्याप्ति दोषों से मुक्त हो, योग शब्द के वाच्यार्थ का ऐसा लक्षण बतला सके जो प्रत्येक प्रसंग के लिये उपयुक्त हो और योग के सिवाय किसी अन्य वस्तु के लिये उपयुक्त न हो

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Bhagwat Gita Chapter 18 Verse 11: कर्म फल का त्यागी है, वही त्यागी है ! आखिर ऐसा क्यों है ?

  Bhagwat Gita Chapter 18 Verse 11: आपको बता दें कि इस लेख में भगवान कृष्ण भागवत गीता के श्लोक के माध्यम से अर्जुन को समझाते है की   कर्म फल का त्यागी है, वही त्यागी है ! आखिर ऐसा क्यों है ? न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः , यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ( अध्याय 18, श्लोक 11 ) न–नहीं; हि-वास्तव में ही; देह-भृता-देहधारी जीवों के लिए; शक्यम्-सम्भव है; त्यक्तुम्-त्यागना; कर्माणि-कर्म; अशेषतः-पूर्णतया; यः-जो; तु-लेकिन; कर्म-फल-कर्मो के फल; त्यागी कर्मफलों को भोगने की इच्छा का त्याग करने वाला; सः वे; त्यागी कर्म फलो का भोगने की इच्छा का त्याग करने वाला; इति-इस प्रकार; अभिधीयते-कहलाता है। अर्थ - देहधारी मनुष्य के द्वारा सम्पूर्ण कर्मों का त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्म फल का त्यागी है, वही त्यागी है। ऐसा कहा जाता है। व्याख्या - देहधारी अर्थात् देह के साथ तादात्म्य रखने वाले मनुष्यों के द्वारा कर्मों का सर्वथा त्याग होना सम्भव नहीं है क्योंकि शरीर प्रकृति का कार्य है और प्रकृति स्वतः क्रियाशील है। अतः शरीर के साथ तादात्म्य (एकता) रखने वाला क्रिय...

Aaj Ka Panchang and Tithi 21 June: शनिवार का पंचांग, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त और राहु काल का समय

    Aaj Ka Panchang and Tithi 21 June 2025  : हिंदू पंचांग के अनुसार (aaj ka panchang) आज शुक्ल पक्ष दशमी तिथि है। इस तिथि पर अतिगंड योग और अश्विनी नक्षत्र बना रहेगा। आज आषाढ़  मास 21 जून दिन शनिवार है। पंचाग के अनुसार आज योगिनी एकादशी, साल का सबसे बड़ा दिन है । आप पूजा के लिए शुभ मुहूर्त  का ध्यान रखें। ब्रह्म मुहूर्त की बात करें तो प्रातः 04:04 बजे से प्रातः 04:44 बजे तक है और अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:55 बजे से दोपहर 12:51 बजे तक रहेगा।  दैनिक पूजा के लिए शुभ मुहूर्त को ध्यान में रखा जाता है, इसलिए इस पंचांग में हम आपको शुभ समय और राहु काल का समय भी बताएंगे ताकि आपको अपनी पूजा का फल मिल सके। ध्यान में रखकर भगवान की पूजा करें। हिंदू पंचांग को वैदिक पंचांग के नाम से जाना जाता है। पंचांग के माध्यम से समय और काल की सटीक गणना की जाती है। पंचांग मुख्य रूप से पाँच भागों से बना होता है। ये पाँच भाग हैं तिथि, नक्षत्र, वार, योग और करण। यहाँ दैनिक पंचांग में हम आपको शुभ मुहूर्त, राहुकाल, सूर्योदय और सूर्यास्त का समय, तिथि, करण, नक...

हिन्दू धर्म

  हिन्दू धर्म में कोई एक अकेले सिद्धान्तों का समूह नहीं है जिसे सभी हिन्दुओं को मानना ज़रूरी है। ये तो धर्म से ज़्यादा एक जीवन का मार्ग है। हिन्दुओं का कोई केन्द्रीय चर्च या धर्मसंगठन नहीं है और न ही कोई "पोप"। इसके अन्तर्गत कई मत और सम्प्रदाय आते हैं और सभी को बराबर श्रद्धा दी जाती है। धर्मग्रन्थ भी कई हैं। फ़िर भी, वो मुख्य सिद्धान्त, जो ज़्यादातर हिन्दू मानते हैं, इन सब में विश्वास: धर्म (वैश्विक क़ानून), कर्म (और उसके फल), पुनर्जन्म का सांसारिक चक्र, मोक्ष (सांसारिक बन्धनों से मुक्ति--जिसके कई रास्ते हो सकते हैं) और बेशक, ईश्वर। हिन्दू धर्म स्वर्ग और नरक को अस्थायी मानता है। हिन्दू धर्म के अनुसार संसार के सभी प्राणियों में आत्मा होती है। मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो इस लोक में पाप और पुण्य, दोनो कर्म भोग सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है।